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Showing posts from September, 2026

जब सीता जी थीं गर्भवती, गर्भवती, गर्भवती। - Tarj - जब जिद पे आ गई पार्वती, पार्वती, पार्वती।

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जब सीता जी थीं गर्भवती, गर्भवती, गर्भवती। समझाने पहुँचे लक्ष्मण जी, लक्ष्मण जी, लक्ष्मण जी। काय दुख सह रही, काय को रो रही, काय दुख सह रही, काय को रो रही, ऐसे वन में जाने, ऐसे वन में जाने। छोड़ अयोध्या चली सीता जी, सीता जी, सीता जी। वाल्मीकि ऋषि ने दिया सहारा, दिया सहारा, दिया सहारा। काहे डर रही, काहे घबरा रही, काहे डर रही, काहे घबरा रही, आश्रम में रह जाने, आश्रम में रह जाने। लव-कुश दोनों जन्मे प्यारे, जन्मे प्यारे, जन्मे प्यारे। वाल्मीकि जी ने शिक्षा दी, शिक्षा दी, शिक्षा दी। राम कथा सुना रहे, राम के गुण गा रहे, राम कथा सुना रहे, राम के गुण गा रहे, अयोध्या में सुनाने, अयोध्या में सुनाने। जब सीता जी धरती पुकारें, धरती पुकारें, धरती पुकारें। धरती मैया गोद में लेंगी, गोद में लेंगी, गोद में लेंगी। काहे दुख सह रही, काहे अब रो रही, काहे दुख सह रही, काहे अब रो रही, धरती में समाने, धरती में समाने।

मेरी अंसुवन भींगी साड़ी, आ जाओ कृष्णा मुरारी

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मेरी अंसुवन भींगी साड़ी, आ जाओ कृष्णा मुरारी मैं पांच पति की नारी, जुए में बाजी हारी दुशासन खींचे साड़ी, आ जाओ कृष्णा मुरारी... करो बचन याद बनवारी, जब उंगली कटी तुम्हारी मैंने फाड़ के, हो मैंने फाड़कर बांधी साड़ी, आ जाओ कृष्णा मुरारी... क्या भूल गए बनवारी, जब रचा स्वयंवर भारी मैं तो बन गई पांडव नारी, आ जाओ कृष्णा मुरारी... जब याद बचन की आई, प्रभु दौड़े-दौड़े आए साड़ी में, हो साड़ी में छुपे बनवारी, आ जाओ कृष्णा मुरारी...

मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन हरे हरे

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  मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन हरे हरे ॥ गज़ानन, हरे हरे, गज़ानन हरे हरे ॥ तूने, भक्तों के, कष्ट हरे, गज़ानन हरे हरे । मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन ... पिता, तुम्हारे, भोले बाबा ॥ डम डम, डमरू बजे, गज़ानन हरे हरे । मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन... माता, तुम्हारी, गौरां मईया ॥ गोदी में, लाल धरे, गज़ानन हरे हरे । मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन... मामी, तुम्हारी, लक्ष्मी मईया ॥ धन, भंडार भरे, गज़ानन हरे हरे । मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन... पत्नी, तुम्हारी, ऋद्धि-सिद्धि मोतियन, माँग भरे, गज़ानन हरे हरे । मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन... मूषक, की है, तेरी सवारी ॥ लड्डुवन, भोग लगे, गज़ानन हरे हरे । मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन... पुत्र, तुम्हारे, शुभ और लाभ ॥ सब कुछ, मंगल करे, गज़ानन हरे हरे । मंदिर में, ज्योत जले, गज़ानन... भक्त, तुम्हारे, खड़े हाथ जोड़े ॥ सारे, विघ्न हरो, गज़ानन हरे हरे ।

गौरी गणेश मनाऊँ आज सुध लीजे हमारी

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गौरी गणेश मनाऊँ आज सुध लीजे हमारी… सुरहिन गैया को गोबर मँगाऊ, दिग धर अगना लीपाऊं, आज सुध लीजे हमारी, गौरी गणेश मनाऊँ आज सुध लीजे हमारी… गंगा जल से स्नान कराऊँ, पीताम्बर पहनाऊं, आज सुध लीजे हमारी, गौरी गणेश मनाऊँ आज सुध लीजे हमारी… हरी हरी दूब मैं खूब चढ़ाऊँ, चन्दन घोल लगाऊं आज सुध लीजे हमारी, गौरी गणेश मनाऊँ आज सुध लीजे हमारी... पहली पूजा करूँ तुम्हारी, पहली पूजा करू तुम्हारी, लड्डू भोग लगाऊं, आज सुध लीजे हमारी ... गौरी गणेश मनाऊँ आज सुध लीजे हमारी…

संतान सप्तमी व्रत कथा

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  । श्री संतान सप्तमी व्रत कथा । एक दिन महाराज युधिष्ठिर ने भगवान से कहा - हे प्रभू ! कोई ऐसा उत्तम व्रत बतलाइये जिसके प्रभाव से मनुष्य के सांसारिक दुःख दूर होकर वे पुत्र एवं पौत्रवान हो जाए । यह सुनकर भगवान बोले - हे राजन !तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है। मैं तुमको एक पौराणिक इतिहास सुनाता हूँ ,ध्यानपूर्वक सुनो! एक समय लोमष ऋषि ब्रजराज की मथुरापुरी में वसुदेव देवकी के घर गए । ऋषिराज को आया हुआ देख दोनों अंत्यंत प्रसन्न हुए तथा उनको उत्तम आसान पर बैठा कर उनका अनेक प्रकार से वंदन और सत्कार किया । फिर मुनि के चरणोदक से अपने घर तथा शरीर को प्रवित्र किया । वह प्रसन्न होकर उनको कथा सुनाने लगे । कथा कहते हुए लौमष ऋषि ने कहा की -हे देवकी ! दुष्ट दुराचारी कंस ने तुम्हारे कई पुत्र मार डेल हैं जिसके कारण तुम्हारा मन अत्यंत दुखी है । इसी प्रकार राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी भी दुखी रहा करती थी, किन्तु उसने संतान सप्तमी का व्रत विधि विधान सहित किया । जिसके प्रताप से उनको संतान का सुख प्राप्त हुआ । यह सुनकर देवकी ने हाथ जोड़कर मुनि से कहा - हे ऋषिराज ! कृपा करके रानी चंद्रमुखी का सम्पूर्ण वृतां...